
जीना न जीना एक लगता है
आग और दरिया एक लगता है
क्यों अब है ज़िन्दगी का हाल ये
दोस्ती का लगता है कमाल ये
सफ़र का हर मोड़ एक लगता है
ख़ुशी या गम सब एक लगता है

समझना चाहता हूँ अंदाज़ ये
क्या असर है सब पर हम साज़ ये
कौन कहता एक-दो पेग का ज़माना है
हमने तो खम्भो को सजाया है
काश होश में बिताते पल अब सरे
साला दारू न होती तो बताते प्यारे
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