Friday, November 19, 2010

याद: रात, चाय और पत्ते


क्यों बे क्या हाल हैं , कैसा है बे
ये सवाल खुल के होते थे कभी
कुत्तो कमीनो ऐसा क्या हो गया है
जो सब हो गए हैं दूर यहाँ वहा

चौराहे पर केतली से चाय पीते थे
चाय पर cheers कर peg बनाते थे
कोशिश करते थे bottoms मारने की
पर synchronized चुस्की ही मारते थे

गालियाँ सुनाते हर ढाबा छानते थे
इसकी - उसकी सबकी टाँगे खींचते थे
पत्ते फेटते पीस उतारते राते बीत जाती
पर आखिरी दाँव पर बेगम ही याद आती

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