Saturday, November 20, 2010

दोस्त और दारु














जीना न जीना एक लगता है
आग और दरिया एक लगता है

क्यों अब है ज़िन्दगी का हाल ये
दोस्ती का लगता है कमाल ये

सफ़र का हर मोड़ एक लगता है
ख़ुशी या गम सब एक लगता है











समझना चाहता हूँ अंदाज़ ये
क्या असर है सब पर हम साज़ ये

कौन कहता एक-दो पेग का ज़माना है
हमने तो खम्भो को सजाया है

काश होश में बिताते पल अब सरे
साला दारू न होती तो बताते प्यारे

Friday, November 19, 2010

याद: रात, चाय और पत्ते


क्यों बे क्या हाल हैं , कैसा है बे
ये सवाल खुल के होते थे कभी
कुत्तो कमीनो ऐसा क्या हो गया है
जो सब हो गए हैं दूर यहाँ वहा

चौराहे पर केतली से चाय पीते थे
चाय पर cheers कर peg बनाते थे
कोशिश करते थे bottoms मारने की
पर synchronized चुस्की ही मारते थे

गालियाँ सुनाते हर ढाबा छानते थे
इसकी - उसकी सबकी टाँगे खींचते थे
पत्ते फेटते पीस उतारते राते बीत जाती
पर आखिरी दाँव पर बेगम ही याद आती

'Tragedy' या 'किस्मत'

चलती है बन्दुक, ऊँगली के इशारे पर
झुकता है चाँद, रश्मि-रथी के इशारे पर !
साला ये life की, tragedy है या किस्मत
आज तक कुछ नहीं किया, किसी के इशारे पर !!