हस्ती हो कुछ भी ,.. पर रहती है तिशनगी
कहते हैं सब सियाह हो गयी है ज़िन्दगी
यारों चाहत अँधेरे की , मज़बूत है अब
क्या हुआ ऐसा जो हरपल , याद आती है शब
हम क्या पुरे ज़माने का यही हाल है ..
ऐसा क्या है जो पूरा हमाम बदनाम है
चाहते थे हम ,... खुल के सुनना सुनाना
पर बस्ती में तो , मुश्किल है गीत गुनगुनाना

सिलसिला क्या चला है ऐसा, की फर्क पड़ता नहीं
जंग लगी जंजीरों को भी , तोडना चाहता नहीं
सोचते थे की कारवा हमेशा पाता है मंजिल
पर क्या करें .. घुट घुट कर टूट गया है दिल
हुआ कुछ ऐसा की ,. न है कोई गुजारिश अधूरी
आरजू है की बे -अदा ही बीत जाए महफ़िल ये पूरी