...और फिर शून्य में ताकते हुए
कल भी इस चार दीवारी की चका चौंध शाम में उस ग्लास ने क्या खूब साथ दिया और रोजाना सा एक हादसा भी हुआ
...और फिर शून्य में ताकते हुए
...
किसी अनजान की भाँति उस पुराने फ्रेम की चमकती किरचियों को सहेजते अहसास हुआ कि फ़ोटो में उस बैट को निहारते इस मुस्कुराते हुए चेहरे से कुछ तो वास्ता ज़रूर है।
और स्याह रात में पंखे की आवाज़ को काटती घड़ी की उस टिक टिक ने जाने कब चौंका दिया...
...और फिर शून्य में ताकते हुए
...
उस चादर की सिलवटों को बेतरतीब कोने से लपेटते हुए अहसास हुआ की ये जो कुछ तकिया गीला सा है, बचपन में उस बैट के टूटने पर गालों पे चखा तो ज़रूर था।
कल भी इस चार दीवारी की चका चौंध शाम में उस ग्लास ने क्या खूब साथ दिया और रोजाना सा एक हादसा भी हुआ
...और फिर शून्य में ताकते हुए
...
किसी अनजान की भाँति उस पुराने फ्रेम की चमकती किरचियों को सहेजते अहसास हुआ कि फ़ोटो में उस बैट को निहारते इस मुस्कुराते हुए चेहरे से कुछ तो वास्ता ज़रूर है।
और स्याह रात में पंखे की आवाज़ को काटती घड़ी की उस टिक टिक ने जाने कब चौंका दिया...
...और फिर शून्य में ताकते हुए
...
उस चादर की सिलवटों को बेतरतीब कोने से लपेटते हुए अहसास हुआ की ये जो कुछ तकिया गीला सा है, बचपन में उस बैट के टूटने पर गालों पे चखा तो ज़रूर था।




